कमाई न हो तब भी पत्नी-बच्चे का खर्च देना होगा: HC

शिमला | 11 सितंबर 2026

क्या कोई पति सिर्फ यह कहकर पत्नी और बच्चे के भरण-पोषण की जिम्मेदारी से बच सकता है कि उसकी फिलहाल कोई या बहुत कम आमदनी है? हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने ऐसे ही एक मामले में साफ किया है कि यदि पति शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ है, तो केवल कमाई नहीं होने का दावा उसे पत्नी और बच्चे की जिम्मेदारी से मुक्त नहीं करता।

यह फैसला एक ऐसे पारिवारिक विवाद में आया, जहां सरकाघाट की फैमिली कोर्ट ने पत्नी और उसके नाबालिग बेटे के लिए कुल 6,000 रुपये प्रति माह भरण-पोषण तय किया था। हाईकोर्ट ने पति की चुनौती खारिज करते हुए इस आदेश को बरकरार रखा।

क्या था पूरा मामला?

पत्नी और उसके नाबालिग बेटे ने सरकाघाट की फैमिली कोर्ट में भरण-पोषण के लिए आवेदन किया था। फैमिली कोर्ट ने पत्नी के लिए ₹2,500 प्रति माह और बेटे के लिए ₹3,500 प्रति माह गुजारा भत्ता निर्धारित किया। यानी दोनों के लिए कुल राशि ₹6,000 हर महीने तय हुई।

पति ने इस आदेश को हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट में चुनौती दी। उसका कहना था कि उसकी कुल मासिक आय केवल ₹6,100 है और इतनी कम आमदनी में ₹6,000 मासिक भरण-पोषण देना उसके लिए संभव नहीं है।

हाईकोर्ट ने क्या कहा?

न्यायमूर्ति अजय मोहन गोयल और न्यायमूर्ति योगेश जसवाल की खंडपीठ ने पति की याचिका खारिज कर दी। अदालत का मूल विचार यह था कि किसी स्वस्थ पति या पिता के लिए केवल यह कहना पर्याप्त नहीं है कि वह इस समय कम नहीं कमा रहा है। उसकी पत्नी और बच्चे के प्रति जिम्मेदारी इससे खत्म नहीं हो जाती।

यानी अदालत ने केवल मौजूदा आय के आंकड़े को देखकर पति को राहत नहीं दी, बल्कि उसकी काम करने की क्षमता और पारिवारिक जिम्मेदारी को भी महत्व दिया।

पत्नी और बच्चे के लिए ₹6,000 ज्यादा नहीं

हाईकोर्ट ने भरण-पोषण की राशि पर भी गौर किया। अदालत ने माना कि मौजूदा आर्थिक परिस्थितियों में पत्नी के लिए ₹2,500 और बढ़ते बच्चे के लिए ₹3,500 प्रति माह इतनी अधिक रकम नहीं है कि हाईकोर्ट इसमें हस्तक्षेप करे।

इसलिए फैमिली कोर्ट का आदेश बरकरार रखा गया और कुल ₹6,000 प्रति माह का भरण-पोषण जारी रहा।

बाद में बनवाए गए प्रमाणपत्रों पर भी सवाल

मामले में पति ने फैमिली कोर्ट के आदेश के बाद जारी कुछ प्रमाणपत्र पेश करते हुए यह दावा किया था कि उसका नाबालिग बेटा अब उसके साथ रह रहा है। हाईकोर्ट ने इस तर्क को भी स्वीकार नहीं किया।

अदालत ने कहा कि जब किसी न्यायिक आदेश को चुनौती दी जाती है, तो उसकी वैधता का आकलन मुख्य रूप से उस सामग्री के आधार पर किया जाता है जो आदेश पारित करते समय निचली अदालत के सामने मौजूद थी। बाद में तैयार किए गए दस्तावेजों को उसी आधार पर पीछे जाकर निचली अदालत के आदेश को गलत साबित करने के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।

कोर्ट ने इन बाद में तैयार किए गए प्रमाणपत्रों को मामले में अपने लाभ के लिए तैयार कराए गए दस्तावेजों जैसा माना।

क्या बेरोजगार पति को हर हाल में भरण-पोषण देना होगा?

यह फैसला ऐसा सामान्य नियम नहीं बनाता कि हर बेरोजगार पति को हर परिस्थिति में एक तय रकम ही देनी होगी।

इस मामले में कोर्ट ने खास तौर पर पति के शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ होने, उसकी पारिवारिक जिम्मेदारी और मामले की परिस्थितियों को देखते हुए निचली अदालत के आदेश में हस्तक्षेप से इनकार किया।

यानी अदालत किसी मामले में व्यक्ति की वास्तविक आर्थिक स्थिति और दूसरे प्रासंगिक तथ्यों को भी देख सकती है। इस फैसले का संदेश यह है कि सिर्फ “मेरी आमदनी नहीं है” कह देना जिम्मेदारी से बचने का स्वतः आधार नहीं है।

पत्नी और बच्चे के अधिकार के नजरिए से क्यों महत्वपूर्ण?

भरण-पोषण के मामलों में अदालत का ध्यान इस बात पर भी रहता है कि पत्नी और बच्चे की बुनियादी जरूरतें कैसे पूरी होंगी। इस मामले में हाईकोर्ट ने ₹6,000 की कुल राशि को अत्यधिक नहीं माना।

एक परिवार के रोजमर्रा के खर्च—खाना, कपड़े, बच्चे की पढ़ाई, स्वास्थ्य और दूसरी आवश्यकताएं—सिर्फ इस कारण खत्म नहीं हो जातीं कि पति फिलहाल नौकरी नहीं कर रहा है। अदालत की टिप्पणी इसी व्यावहारिक पक्ष को सामने लाती है।

इस फैसले से आम लोगों के लिए क्या सीख मिलती है?

भरण-पोषण के विवाद में सिर्फ यह देखना पर्याप्त नहीं होता कि किसी व्यक्ति की वर्तमान आय कितनी है। उसकी काम करने की क्षमता, पारिवारिक जिम्मेदारियां, उपलब्ध साक्ष्य और निचली अदालत के सामने मौजूद सामग्री भी महत्वपूर्ण हो सकती है।

इस मामले में हाईकोर्ट ने यह भी साफ किया कि बाद में तैयार किए गए दस्तावेजों को लेकर अदालत सावधानी बरतेगी, खासकर जब वे पहले से तय न्यायिक आदेश को चुनौती देने के उद्देश्य से सामने आए हों।

एक नजर में
मुद्दा विवरण
अदालत हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट
पीठ न्यायमूर्ति अजय मोहन गोयल व न्यायमूर्ति योगेश जसवाल
मामला पत्नी व नाबालिग बेटे का भरण-पोषण
पत्नी के लिए ₹2,500/माह
बेटे के लिए ₹3,500/माह
कुल ₹6,000/माह
पति का दावा मासिक आय करीब ₹6,100
हाईकोर्ट का फैसला पति की याचिका खारिज
मुख्य बात स्वस्थ पति केवल कमाई न होने का दावा करके जिम्मेदारी से नहीं बच सकता

OpinionJester का निष्कर्ष

हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट का यह फैसला एक महत्वपूर्ण बात सामने रखता है—परिवार की जिम्मेदारी केवल उस समय खत्म नहीं हो जाती जब पति के नाम पर तत्काल आय दिखाई न दे। मामले में अदालत ने पति के स्वस्थ होने, पत्नी और बच्चे की जरूरतों तथा उपलब्ध रिकॉर्ड को देखते हुए फैमिली कोर्ट के ₹6,000 मासिक भरण-पोषण के आदेश को बरकरार रखा।

हालांकि, इस फैसले को यह मानकर नहीं पढ़ना चाहिए कि हर मामले में यही राशि या यही परिणाम होगा। भरण-पोषण की राशि और जिम्मेदारी का निर्धारण संबंधित मामले के तथ्यों, आर्थिक स्थिति और लागू कानून के आधार पर किया जाता है

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