# विधायकों की पेंशन और सुविधाओं पर सुप्रीम कोर्ट की नजर, UP सरकार से मांगा जवाब

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- Published: 2026-09-13T15:04:11+05:30
- Author: OpinionJester

**नई दिल्ली | 13 सितंबर 2026**

उत्तर प्रदेश के मौजूदा और पूर्व विधायकों को मिलने वाली **पेंशन, भत्तों और दूसरी 
सुविधाओं** को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक अहम संवैधानिक चुनौती सामने आई है। अदालत 
ने इस मामले में **उत्तर प्रदेश सरकार को नोटिस जारी कर चार सप्ताह के भीतर जवाब देने
को कहा है।** याचिका NGO **लोक प्रहरी (Lok Prahari)** की ओर से दाखिल की गई है।

यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि सवाल केवल किसी एक लाभ या एक रकम का नहीं है।
मूल मुद्दा यह है कि **क्या राज्य विधानमंडल अपने मौजूदा और पूर्व सदस्यों के लिए पेंशन
तथा दूसरी सुविधाओं का प्रावधान कानून बनाकर कर सकता है और क्या ऐसी व्यवस्था संविधान
की कसौटी पर खरी उतरती है।**

## विवाद की शुरुआत कहां से हुई?

लोक प्रहरी ने उत्तर प्रदेश के **State Legislature (Members’ Emoluments and Pension)
Act, 1980** के विभिन्न प्रावधानों को चुनौती दी है। इन प्रावधानों के तहत मौजूदा सदस्यों
को अलग-अलग भत्ते और सुविधाएं तथा पूर्व सदस्यों, उनके परिवारों और कुछ मामलों में 
companions के लिए भी लाभ का प्रावधान है। पेंशन और family pension भी इसी कानूनी ढांचे
का हिस्सा हैं।

इससे पहले **इलाहाबाद हाईकोर्ट** ने इस कानून के चुनौती दिए गए प्रावधानों को बरकरार
रखा था। अब लोक प्रहरी ने उसी फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है।

## लोक प्रहरी की मुख्य आपत्ति क्या है?

याचिकाकर्ता का प्रमुख तर्क है कि संविधान के **अनुच्छेद 195** में राज्य विधानमंडल
के सदस्यों के वेतन और भत्तों की बात की गई है, लेकिन पेंशन का स्पष्ट उल्लेख नहीं 
है। संगठन का कहना है कि इसलिए विधायकों को पेंशन देने की वैधानिक व्यवस्था पर संवैधानिक
सवाल उठता है।

इसके अलावा याचिका में **अनुच्छेद 14** यानी समानता के अधिकार का भी मुद्दा उठाया गया
है। लोक प्रहरी का तर्क है कि विधायकों के लिए ऐसी सुविधाओं की व्यवस्था को समानता 
के संवैधानिक सिद्धांत की कसौटी पर परखा जाना चाहिए।

## विधायक बनाम सरकारी कर्मचारी—क्या तुलना सही है?

यही इस मामले का एक अहम कानूनी सवाल है।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा था कि विधायक और सरकारी कर्मचारी एक जैसी संवैधानिक स्थिति
में नहीं होते। विधायकों की भूमिका कानून बनाना, जनता का प्रतिनिधित्व करना और सरकार
की निगरानी करना है। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने माना कि उन्हें एक **अलग वर्ग** के रूप
में देखा जा सकता है और केवल समानता के सिद्धांत के आधार पर उनके लाभों को सरकारी कर्मचारियों
के लाभ से नहीं तौला जा सकता।

हाईकोर्ट ने यह भी कहा था कि लाभों की मात्रा तय करना मूल रूप से **legislative policy**
का विषय है। अदालतें तब तक नीति में हस्तक्षेप नहीं करेंगी जब तक कोई प्रावधान स्पष्ट
रूप से मनमाना या अनुचित न हो।

## हाईकोर्ट ने कानून को क्यों सही माना था?

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने फैसले में 2018 के सुप्रीम कोर्ट के **Lok Prahari v. Union
of India** मामले का भी उल्लेख किया था। हाईकोर्ट के अनुसार उस फैसले में पूर्व विधायकों
को पेंशन और अन्य लाभ देने के लिए विधानमंडल की संवैधानिक क्षमता को मान्यता दी जा 
चुकी थी।

इसी आधार पर हाईकोर्ट ने 1980 के कानून के चुनौती दिए गए प्रावधानों को बरकरार रखा 
था और लोक प्रहरी की PIL खारिज कर दी थी।

## 1952 से अब तक कितना बदला?

याचिका में यह भी बताया गया है कि उत्तर प्रदेश में 1952 के शुरुआती दौर में विधायकों
को लगभग **₹200 वेतन** मिलता था और सुविधाएं भी सीमित थीं। लोक प्रहरी ने दावा किया
है कि अब यह राशि **₹1.25 लाख से अधिक** हो चुकी है और इसके अलावा कई तरह की सुविधाएं
भी उपलब्ध हैं।

यानी याचिकाकर्ता इस मामले को सिर्फ पेंशन तक सीमित नहीं रख रहा, बल्कि समय के साथ 
विधायकों के **कुल remuneration और benefits structure** में हुए विस्तार को भी सवालों
के घेरे में ला रहा है।

## सुप्रीम कोर्ट ने अभी क्या फैसला दिया है?

यहां सबसे जरूरी बात समझना चाहिए—**सुप्रीम कोर्ट ने अभी यह नहीं कहा है कि विधायकों
की पेंशन या दूसरी सुविधाएं असंवैधानिक हैं।**

फिलहाल जस्टिस **विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता** की पीठ ने उत्तर प्रदेश सरकार 
को नोटिस जारी किया है और **चार सप्ताह में जवाब** मांगा है। इसके बाद मामले में आगे
सुनवाई होगी।

यानी अभी यह मामला **प्रारंभिक न्यायिक समीक्षा** के चरण में है।

## क्या अभी MLA-MLC की पेंशन बंद होगी?

**नहीं।**

इस आदेश के बाद उत्तर प्रदेश में मौजूदा व्यवस्था अपने आप बंद नहीं हुई है। सुप्रीम
कोर्ट ने फिलहाल सरकार का जवाब मांगा है। जब तक अदालत आगे कोई आदेश नहीं देती, मौजूदा
कानूनी व्यवस्था जारी रहेगी।

इसलिए इस खबर को “विधायकों की पेंशन खत्म” के रूप में देखना सही नहीं होगा।

## मामला सिर्फ MLA तक सीमित नहीं

याचिका में उत्तर प्रदेश के **MLA और MLC दोनों** के लिए उपलब्ध पेंशन और अन्य लाभों
को चुनौती दी गई है। इसके अलावा पूर्व सदस्यों, उनके परिवार और संबंधित दूसरी सुविधाओं
का भी कानूनी ढांचा सवालों के घेरे में है।

इसलिए आगे अदालत का फैसला उत्तर प्रदेश के विधायकों और विधान परिषद सदस्यों से जुड़े
लाभों की संवैधानिक स्थिति पर महत्वपूर्ण असर डाल सकता है।

## आगे की सुनवाई में किन सवालों पर नजर रहेगी?

अब इस मामले में कुछ सवाल खास तौर पर महत्वपूर्ण होंगे:

क्या अनुच्छेद 195 राज्य विधानमंडल को पेंशन से जुड़ा कानून बनाने की पर्याप्त शक्ति
देता है?

क्या मौजूदा और पूर्व विधायकों को पेंशन और दूसरी सुविधाएं देना अनुच्छेद 14 के तहत
समानता के सिद्धांत के अनुरूप है?

क्या 2018 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद इस मुद्दे पर संवैधानिक स्थिति पहले ही
तय हो चुकी है, या वर्तमान याचिका में नए सवालों पर विचार की गुंजाइश है?

इन सवालों के जवाब आगे की सुनवाई में महत्वपूर्ण रहेंगे।

### इस मामले को समझिए

| मुद्दा | स्थिति | 
| याचिकाकर्ता | **लोक प्रहरी** | 
| मामला | MLA/MLC पेंशन व अन्य लाभ | 
| संबंधित कानून | UP Legislature (Members’ Emoluments and Pension) Act, 1980 | 
| हाईकोर्ट का फैसला | कानून के प्रावधान बरकरार | 
| सुप्रीम कोर्ट | UP सरकार को नोटिस | 
| जवाब की समयसीमा | **4 सप्ताह** | 
| पीठ | जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता | 
| क्या पेंशन अभी बंद हुई? | **नहीं** | 
| अगला चरण | सरकार के जवाब के बाद आगे सुनवाई |

## OpinionJester का निष्कर्ष

सुप्रीम कोर्ट का यह कदम फिलहाल **पेंशन बंद करने का फैसला नहीं**, बल्कि यह जांच आगे
बढ़ाने की शुरुआत है कि उत्तर प्रदेश में विधायकों और विधान परिषद सदस्यों के लिए पेंशन
व दूसरी सुविधाओं का कानूनी ढांचा संविधान के अनुरूप है या नहीं।

इलाहाबाद हाईकोर्ट पहले ही इस कानून को वैध मान चुका है, लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट इस
चुनौती पर उत्तर प्रदेश सरकार का पक्ष सुन रहा है। अगले कुछ हफ्तों में सरकार का जवाब
इस मामले की दिशा तय करने में अहम होगा।

सबसे बड़ी बात यह है कि यह विवाद **“विधायकों को पेंशन मिलनी चाहिए या नहीं”** से आगे
बढ़कर इस सवाल पर पहुंच गया है कि जनप्रतिनिधियों के वित्तीय लाभ तय करने की संवैधानिक
सीमाएं क्या हैं और उन पर न्यायिक समीक्षा की गुंजाइश कितनी है।
